हजरत बिलाल की अजान सुन कर लश्करे इस्लाम पर रिक्कत

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*_🥀हजरत बिलाल की अजान सुन कर लश्करे इस्लाम पर रिक्कत🥀_*



✏️ हुजूरे अक्दस, जाने आलम व जाने रहमत सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम
| के आशिके सादिक और मुअज्ज़िन हज़रत बिलाल बिन हुमामा हब्शी रदियल्लाहो तआला
| अन्हो हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम की रेहलत के बाद मदीना तय्यबह
| से मुल्के शाम चले आए थे और शहर दमिश्क में सुकूनत इख्तियार कर ली थी। हज़रत बिलाल
को इस्लामी लश्कर की आमद की इत्तिला' मिली तो वह भी जैशे इस्लाम में शामिल हो गए
| और राहे खुदा में जेहाद का शौक उमड पड़ा। अमीरुल मो'मिनीन हज़रत उमर फारूके आ ज़म
| की बैतुल मुकद्दस में तशरीफ आवरी हुई तब हज़रत बिलाल इस्लामी लश्कर में मौजूद थे। आप
भी अमीरुल मो'मिनीन से मिलने आए, सलाम किया और आप की ता'ज़ीम व तक्रीम की।
हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम के पर्दा फरमाने के बाद |
हज़रत बिलाल ने अज़ान कहना तर्क कर दिया था। अपने आका व मौला सल्लल्लाहो तआला
| अलैह व सल्लम की जुदाई व फुर्कत में वह इतने अन्दोहगी हो गए थे कि कलेमाते अज़ान
अदा करना दुश्वार था और वह अपने महबूब आका सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम
की मुफारकत में इतने गमनाक हुए कि उन्हों ने अज़ान देनी छोड़ दी।
जब जोहर की नमाज़ का वक्त हुवा तो मुजाहिदों ने अमीरुल मो'मिनीन हज़रत
| उमर से दरख्वास्त की कि हज़रत बिलाल यहां मौजूद हैं । हम चाहते हैं कि आज इन की
| जबान से अजान सुनें और हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम के ज़मानए
| खैरुल करून की याद ताज़ा करें । हज़रत उमर फारूके आ'ज़म ने हज़रत बिलाल से फरमाया
| कि ऐ बिलाल ! अस्हाबे रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम की ख्वाहिश व
| दरख्वास्त है की आप अज़ान कहो और इन को हुजूरे अक्दस रहमते आलम सल्लल्लाहो
| तआला अलैह व सल्लम के ज़माना की याद ताजा करा दो । हालां कि हज़रत बिलाल
ने अज़ान देना बिल्कुल तर्क कर दिया था। कई लोगों ने उस से कब्ल अज़ान कहने की दरख्वास्त की थी , लेकिन उन्हों ने किसी की दरख्वास्त मन्जूर न की । लैकिन चूं कि हज़रत बिलाल के दिल में हज़रत उमर फारूके आ'जम का गायत दर्जा अदब व एहतराम था । आज अमीरुल मो'मिनीन हज़रत उमर फारूके आ'जम की फरमाइश है , इन्कार मुम्किन न हुवा और | बिलाल अज़ान कहने के लिये रजा मन्द हो गए । हज़रत उमर फारूक अमीरुल मो'मिनीन की फरमाइश हज़रत बिलाल के लिये हुक्म का दर्जा रखती थी । हज़रत बिलाल ने अज़ान शुरू की । बुलन्द आवाज़ से " अल्लाहु अक्बर , अल्लाहु | अक्बर " कहा । इन की दर्द भरी आवाज़ सहाबा के कानों से टकराई और इन पर एक लरज़ह | तारी हो गया । आंखें नमनाक हो गई और वह शिद्दते गम से कांपने लगे । फिर हज़रत बिलाल | ने बारे दोम " अल्लाहु अक्बर , अल्लाहु अक्बर " कहा । अब इन की आवाज़ में दर्द इत्ना | ज़ियादह था कि सुनने वालों के लिये बरदाश्त करना दुश्वार था । हज़रत बिलाल अज़ान के | कलेमात दुहराते जाते और इन का लहजा और दर्द अंगेज़ होता जाता । और जब " अश्हदो अन्ना मुहम्मदर्रसूलुल्लाह ' कहा तो लश्करे इस्लाम में कोहराम मच गया । सहाबए किराम | रिज़वानुल्लाहे तआला अलैहिम अज्मईन की नज़रों में हुजूरे अक्दस सल्लल्लाहो तआला | अलैह व सल्लम का मुकद्दस ज़माना फिर गया और हुजूरे अक्दस की याद और फिराक के गम में तड़पने लगे , आह व बुका का वह शौर बुलन्द हुवा कि पत्थर दिल भी पिघल जाए । | इस्लामी लश्कर का हर मुजाहिद चीख चीख कर रोने लगा । शिद्दते गम से मुजाहिदीन ऐसे | | बिलकते और तड़पते थे कि लगता था कि इन के दिल फट जाएंगे । बा'ज़ नीम गशी की हालत | में जमीन पर गिर पड़े , अपने महबूब आका व मौला सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम | की यादे रफ्ता कुछ यूं ताज़ा हूई कि चारों तरफ गिर्या व ज़ारी का माहौल गर्म हो गया । हज़रत | उमर फारूके आ'जम भी बे इख्तियार रो रहे हैं । हज़रत बिलाल की हालत भी दिगर गूं है । अज़ान के हर कल्मे पर इन का कलक व इज्तिराब बढ़ता जाता था । और ऐसा महसूस होता | कि वह बैः हौश हो कर गिर जाएंगे और अज़ान पूरी न कर सकेंगे । इस्लामी लश्कर पर गम | व इज्तिराब की वह कैफियत तारी थी कि रोने और चीखने की आवाजों के सिवा कुछ सुनाई | | न देता था और ऐसा लगता था कि हज़ारों की जानें निकल जाएंगी । किसी को भी अपने तन | व जां का हौश नहीं था : अले सैर व तवारीख बयान करते हैं कि उस दिन अमीरुल मो'मिनीन हज़रत उमर फारूके आ ' ज़म और तमाम मुसल्मान इत्ना रोए हैं कि किसी को इत्ना रोता हुवा न तो देखा | | गया और न ही सुना गया । हर एक की आंख से अश्क का दरिया रवां था । अपने महबूब आका सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम की याद व जुदाई के गम में हर एक ने रो रो कर अपनी आंखें लाल कर ली थीं : बहर हाल हज़रत बिलाल ने रोते , तड़पते , किसी तरह अज़ान पूरी की । सहाबए किराम के सामने अपने आका व मौला सल्लल्लाहो तआला अलैह व सल्लम का वह मन्ज़र | आ गया , जो कभी वह माथे की आंखों से देखा करते थे । दैर तक लश्करे इस्लाम का हर | मुजाहिद ज़ार व कितार रोता रहा । हज़रत उमर फारूके आ'जम और हज़रत बिलाल भी मुसल्सल रोते रहे । बिल - आखिर अल्लाह तआला ने इन्हें तस्कीन दी । फिर हज़रत उमर फारूके आ'ज़म ने तमाम लश्कर को जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ाई ।
*आंखें रो रो के सुजाने वाले जाने वाले नहीं आने वाले और देख ओ ज़ख्मे दिल को संभाल फूट बहते हैं टपक्ने वाले*

*याद में जिस की नहीं होशे तनो जां हम को फिर दिखा दे वो रुख , ऐ महरे फरोजां हम को*

*📚 सर कटाते तेरे नाम पर मर्दाने अरब हिस्सा 2 साफा 196-197-198*



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*🏁 मसलके आला हज़रत 🔴*

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20 अप्रैल 571 ईस्वी