हज़रत ताजुल औलिया हज्जे बैतुल्लाह शरीफ़ और अजमेर शरीफ़ की सैर

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*🥀 हज़रत ताजुल औलिया हज्जे बैतुल्लाह शरीफ़ और अजमेर शरीफ़ की सैर 🥀*



✏️ एक बूढ़ा शख्स मदारस से हुज़ूर बाबा ताजुद्दीन सरकार की बारगाह में इस गरज़ से हाज़िर हुआ की सरकार मुझे मक्का मुअज़्ज़मा पहुंचा दे तो मैं भी हज कर आऊं हाज़िर होकर अर्ज़ किया के हुज़ूर आपके पास राजा और नवाब आते हैं किसी से इतनी रकम दिला दो कि मैं हज कर आऊँ

✏️ हुजूर ने इत्मिनान दिलाया जब हज का वक्त करीब आया तो मदारसी साहब बहुत बेचैन हुए और बाबा ताजुद्दीन की बारगाह में अर्ज़ किया कि हुज़ूर कल से हज शुरू हो जाएगा और आपने मुझे मक्का शरीफ नहीं पहुंचाया दूसरे दिन सरकार ताजुद्दीन ताजुल औलिया बदस्तूर घूमने निकले तो यह ज़ईफ़ भी अपना मअरुज़ा लिए हुए हुज़ूर के हमराह हो गए थोड़ी दूर चलने के बाद हुज़ूर ने ज़ईफ़ का हाथ पकड़ा और कुछ दूर चलने के बाद ज़ईफ़ को बैठने का हुक्म दिया ज़ईफ़ वहीं बैठ गए थोड़ी देर के बाद नींद आ गई देखते क्या हैं की ये मक्का में हाजियों के साथ हज कर रहे हैं

✏️ यहाँ तक की वी ज़ईफ़ शख्स वहीँ से हज के अरकान अदा किये और हफ्ता अशरा के बाद जब हुज़ूर वहां पहुंचे तो ज़ईफ़ से फरमाया क्या यहीं पड़ा रहेगा चुनानचे वह ज़ईफ़ उठे और मस्ताना वार बाबा ताजुद्दीन सरकार के हमराह हो गए

*📚 [ अज़कारे ताजुल औलिया पेज़ नम्बर 360 ]*

✏️ एक साहब हज़रत बाबा ताजुद्दीन शाह रहमतुल्लाह अलैह की खिदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया सरकार मैं अजमेर शरीफ जाना चाहता हूं हुज़ूर ने फरमाया की अजमेर शरीफ तो यहीं है कहां जाना है हुज़ूर ने जैसे ही उनके हाथ पर अपना हाथ रखा की अचानक मंज़र बदल गया देखता क्या है कि वह अजमेर शरीफ की मुकद्दस गलियों में घूम रहा है हुज़ूर ने जैसे ही उसके हाथ को छोड़ा तो फिर वह वहीं मौजूद है ना वह मंज़र है ना अजमेर शरीफ

*📚 [ अज़कारे ताजुल औलिया पेज़ नम्बर 379 ]*



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