आलम पनाह हाजी वारिस पाक रहमतुल्लाह अलैह और हलवे का तबर्रुक
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*🥀 आलम पनाह हाजी वारिस पाक रहमतुल्लाह अलैह और हलवे का तबर्रुक 🥀*
✏️ एक शरीफ़ दीनदार मुसलमान जो फ़ना फ़िल्लाह बाक़ी बिल्लाह हज़रत सय्यद हाजी वारिस अली शाह अलैहिर्रहमा के मुरीद थे उन्होंने अपना एक वाक्या उस्ताद उल उलेमा हज़रत सय्यद अब्दुल ग़फ़्फ़ार मुजद्दिदी क़ादिरी साहब से फ़रमाया कि, "मेरे पीरो मुर्शिद हज़रत हाजी वारिस पाक साहब मल्लावा में मुक़ीम थे और मैं रोज़ाना पीरो मुर्शिद की खिदमत में हाज़िरी दिया करता था रास्ते में गंजमुरादाबाद पड़ता था और हज़रत मौलाना गंजमुरादाबादी की मस्जिद के सामने से ही जाते हुए रोज़ाना मौलाना साहब को सलाम करता था एक दिन मैंने हज़रत हाजी वारिस पाक के लिए बादाम का हलवा तैयार कराया और जब लेकर चला तो ख्याल आया कि आज मस्जिद के पीछे से जाँऊ, कहीं ऐसा न हो कि हज़रत मौलाना गंजमुरादाबादी देख ले और चखले तो हलवा झूठा हो जाएगा तो फ़िर मैं मस्जिद के पीछे से गया और जब हज़रत हाजी वारिस पाक साहब की कयामगाह पर पहुंचा तो मुझको देखते ही हाजी साहब जलाल में आ गए और फ़रमाया, " निकालो इस मरदूद को यह मेरा मुरीद नहीं है हज़रत (मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी साहब) चख लेते तो तबर्रुक हो जाता झूठा न होता" यह सुनकर मैं सहम गया ।
✏️ दूसरे फ़क़ीरो ने मुझसे पूरा हाल सुनकर मुझको मशवरा दिया कि फ़ौरन वापस जाकर हज़रत मौलाना गंजमुरादाबादी से जाकर माफ़ी माँगो नहीं तो हमेशा के लिए खारिज हो जाओगे मैं गंजमुरादाबाद वापस आया तो देखा कि हज़रत मौलाना शाह फ़ज़्ले रहमा गंजमुरादाबादी रहमतुल्लाह अलैह अपनी मस्जिद के सहन में टहल रहे थे और मुझको देखकर फ़रमाया, "निकाले गए हो लाओ ज़रा सा चख लूँ तबर्रुक हो जाएगा तो हाजी साहब क़बूल कर लेंगे "ज़रा सा हलवा हज़रत ने चख लिया और फ़रमाया, "अब जाओ "
✏️ फिर मैं हाजी वारिस अली शाह साहब की खिदमत में पहुंचा तो देखते ही उन्होंने फ़रमाया कि, "अब यह मेरा मुरीद है तबर्रुक लाया है इसको मैं ज़रुर खाऊँगा "
*📚 (इनामात ए रहमान बा तुफ़ैल व बिहुर्मति मौलाना फ़ज़्ले रहमान : सफ़ा 204-205)*
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*🏁 मसलके आला हज़रत 🔴*
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