हुज़ुर मुफ़्ती ए आज़म् हिंद मुस्तफ़ा रज़ा खान नूरी रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी
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*🥀 हुज़ुर मुफ़्ती ए आज़म् हिंद मुस्तफ़ा रज़ा खान नूरी रहमतुल्लाह अलैह की हालाते ज़िन्दगी 🥀*
🔛⁵ *आपकी ज़ात तक़वा, तहारत, परहेज़गारी और ग़रीब परवरी का मुजस्समा थी। एक-एक सिफ़त में आला हज़रत के नक़्श-ए-क़दम पर थे।*
*1. तक़वा-ओ-परहेज़गारी*
1. *निगाह की हिफ़ाज़त*: 92 साल की उम्र तक ग़ैर-महरम पर नज़र नहीं पड़ी। बाज़ार से गुज़रते तो निगाहें नीची रखते। फ़रमाते: "आँख दिल का दरवाज़ा है, इसे गुनाह से बचाओ।"
2. *शुबहात से बचाव*: अगर किसी खाने में हलाल का शक होता, भूखे रहते मगर न खाते। एक बार दावत में गए, पता चला घी में मिलावट का शक है, हाथ रोक लिया।
3. *तहज्जुद के पाबंद*: आख़िरी वक़्त तक तहज्जुद नहीं छूटी।
4. *ग़ीबत से नफ़रत*: मजलिस में कोई किसी की ग़ीबत करता तो फ़ौरन रोक देते: "भाई, अपना नामा-ए-आमाल काला मत करो।"
5 बड़ी उमर में कमजोरी के बावजूद आखरी दम तक कभी नफील नमाज़ बैठ कर नहीं पढ़ी
*2. तहारत-ओ-पाकीज़गी*
1. *हर वक़्त बा-वुज़ू*: वुज़ू टूटते ही नया वुज़ू। फ़रमाते: "वुज़ू मोमिन का हथियार है।"
2. *लिबास की पाकी*: कुर्ता टख़नों से ऊपर, टोपी-कंधे पर इमामा। कपड़े पर मामूली दाग़ भी बर्दाश्त नहीं।
3. *मिस्वाक के आशिक़*: हर नमाज़ से पहले मिस्वाक। विसाल के वक़्त भी मिस्वाक तकिए के नीचे थी।
4. *जिस्म-ओ-जान पाक*: 92 साल की उम्र में भी बदन से ख़ुशबू आती। ये इश्क़-ए-रसूल ﷺ का असर था।
*3. ग़रीब परवरी-ओ-शफ़क़त*
1. *लंगर जारी*: बरेली शरीफ़ में आपके दरवाज़े पर रोज़ाना सैकड़ों ग़रीब खाते। ख़ुद आख़िर में बचा-खुचा खाते।
2. *क़र्ज़ उतारना*: किसी मुरीद पर क़र्ज़ होता तो चुपके से अदा कर देते। कह देते: "किसी से ज़िक्र मत करना, वरना क़ुबूल न होगा।"
3. *बेवा-यतीमों की किफ़ालत*: बरेली में बेवा औरतों के घर महीना पहुँचता। यतीम बच्चों की शादी अपने ख़र्चे से कराते।
4. *वाक़िया*: एक ग़रीब मुरीद सर्दी में बिना गरम कपड़े के आया। आपने अपना नया कम्बल उतार कर दे दिया और फ़रमाया: "मुस्तफ़ा को सर्दी बर्दाश्त है, मुरीद को नहीं।"
*4. तलबा-ए-इल्म की फ़िक्र*
1. *दारुल उलूम मंज़र-ए-इस्लाम*: आला हज़रत का क़ायम किया मदरसा आपने ज़िंदा रखा। ख़ुद दर्स देते।
2. *तलबा का वज़ीफ़ा*: हिंदुस्तान भर से ग़रीब तलबा बरेली पढ़ने आते। आप उनके खाने, कपड़े, किताब का इंतज़ाम करते।
3. *इम्तिहान*: हर तालिब-ए-इल्म से ख़ुद इम्तिहान लेते। कमज़ोर को रात में अलग से पढ़ाते।
4. *नसीहत*: तलबा से फ़रमाते: "इल्म अमल के लिए है। बे-अमल आलिम, बे-फल दरख़्त की तरह है।"
5. *वाक़िया*: एक तालिब-ए-इल्म के पास जूता नहीं था। आपने अपना जूता दे दिया और नंगे पाँव घर आए।
*5. ग़रीब मुरीदों पर शफ़क़त*
1. *नाम बनाम लेना*: लाखों मुरीद थे मगर ग़रीब मुरीद का नाम ज़बानी याद रखते। ख़त में हाल पूछते।
2. *बीमारपुर्सी*: किसी ग़रीब मुरीद के बीमार होने की ख़बर मिलती तो मीलों पैदल चलकर या रिक्शे से अयादत को जाते।
3. *दुआ का तोहफ़ा*: ग़रीब कुछ नज़र न दे पाता तो फ़रमाते: "तेरी दुआ ही मेरी नज़र है।"
4. *वाक़िया-ए-मेवात*: मेवात के ग़रीब मेवों को बचाने के लिए 3 महीने वहाँ रहे। उनके साथ ज़मीन पर सोते, वही बाजरे की रोटी खाते। फ़रमाते: "ये मेरे नबी ﷺ के ग़रीब उम्मती हैं।"
*हुज़ूर ताजुश्शरिया फ़रमाते*:
"नाना जान की गोद में ग़रीब-ओ-अमीर का फ़र्क़ मिट जाता था। बादशाह भी आए तो ज़मीन पर, फ़क़ीर भी आए तो ज़मीन पर।"
*ख़ुलासा*: हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म *"फ़क़ीरों के बादशाह और बादशाह दीन के फ़क़ीर"* थे।
तक़वा ऐसा कि फ़रिश्ते रश्क करें, शफ़क़त ऐसी कि माँ भी शरमा जाए।
*अल्लाह हमें भी हुज़ूर मुफ़्ती-ए-आज़म के नक़्श-ए-क़दम पर चलाए। आमीन 🤲*
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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*
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